रात तन्हा चाँद और मैं,कुछ आधी अधूरी सी कुछ तुझमें खोयी सी उसी पुराने मेरे घर की छत पर बैठ तेरे आने का इंतजार कर रही हूँ।पहले रातें तनहा थीं चाँद तनहा था बस हम तनहा नहीं थे क्योंकि उस तनहा चाँद को देख हम एक दूसरे के तनहा रातों के संगी जो बन जाते थे।वो चांदनी रात में हमारी आँखों आँखों वाली गुफ्तगू सच कहूं बहुत याद आती है।पर अब कुछ शायद बहुत कुछ बदल गया है अब हमारी चांदनी रात वाली गुफ्तगू नहीं होती।अब चाँद भी तनहा रात भी तनहा मैं भी तनहा और तुम ●●●●●●●●● कहो न क्या तुम भी तनहा हो
"दस्तूर समाज के", को प्रतिलिपि पर पढ़ें : https://hindi.pratilipi.com/story/8Heky6IQKXtR?utm_source=android&utm_campaign=content_share भारतीय भाषाओँ में अनगिनत रचनाएं पढ़ें, लिखें और दोस्तों से साझा करें, पूर्णत: नि:शुल्क
तुम कहते थे पहाड़ी वाले घर पर रहना है,सुनो ढूंढ लिया है पहाड़ी पर घर जहां सूरज की पहली किरन हमें जगायेगी , सुनो ढूंढ लिया है पहाड़ी पर घर जहां से बारिश की फूहारें खिड़की ...