रात,तन्हा चाँद और मैं
रात तन्हा चाँद और मैं,कुछ आधी अधूरी सी कुछ तुझमें खोयी सी उसी पुराने मेरे घर की छत पर बैठ तेरे आने का इंतजार कर रही हूँ।पहले रातें तनहा थीं चाँद तनहा था बस हम तनहा नहीं थे क्योंकि उस तनहा चाँद को देख हम एक दूसरे के तनहा रातों के संगी जो बन जाते थे।वो चांदनी रात में हमारी आँखों आँखों वाली गुफ्तगू सच कहूं बहुत याद आती है।पर अब कुछ शायद बहुत कुछ बदल गया है अब हमारी चांदनी रात वाली गुफ्तगू नहीं होती।अब चाँद भी तनहा रात भी तनहा मैं भी तनहा और तुम ●●●●●●●●●
कहो न क्या तुम भी तनहा हो
कहो न क्या तुम भी तनहा हो

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